‘अब नहीं सहेंगे’—नई खदानों के खिलाफ ग्रामीणों की आर-पार की लड़ाई
बरमकेला। तहसील सरिया के कटंगपाली, जोतपुर, बोंदा और छेलफोरा क्षेत्र में डोलोमाइट खदानों से फैल रहे प्रदूषण और जनस्वास्थ्य संकट की समस्या कोई नई नहीं है। वर्षों से ग्रामीण धूल, प्रदूषण, बीमारी और बर्बाद होती खेती की मार झेल रहे हैं।इसके बावजूद अब इसी क्षेत्र में चार नई डोलोमाइट खदानों के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति की तैयारी शुरू हो गई है, जिससे लोगों में भारी आक्रोश है। मामला अब प्रशासन, खनिज विभाग और पर्यावरण विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन जनता की बजाय खनन कंपनियों के पक्ष में काम कर रहा है। सरपंचों से यह कहकर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं कि केवल सूचना प्रसारित करनी है, जबकि दस्तावेज जनसुनवाई प्रक्रिया से जुड़े हैं। कई जगह बिना पूरी जानकारी दिए हस्ताक्षर करवाने के आरोप भी लगे हैं।सबसे गंभीर बात यह है कि पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) रिपोर्ट अंग्रेजी में उपलब्ध कराई गई है, जिसे अधिकांश ग्रामीण समझ नहीं पाते। इस कारण जनसुनवाई प्रक्रिया को केवल औपचारिकता बताया जा रहा है।
चार नई खदानों का प्रस्ताव
जारी अधिसूचना के अनुसार चार नई खदानों की योजना बनाई गई है:
ग्राम जोतपुर (बोंदा) – 4.8016 हेक्टेयर, 1,20,000 टन/वर्ष
ग्राम कटंगपाली – 2.881 हेक्टेयर, 1,50,000 टन/वर्ष
ग्राम छेलफोरा – 1.927 हेक्टेयर, 1,14,160 टन/वर्ष
ग्राम जोतपुर – 4.26 हेक्टेयर, 2,00,114 टन/वर्ष
इन खदानों के लिए 6 अप्रैल को ग्राम पंचायत बोंदा में संयुक्त जनसुनवाई प्रस्तावित है। लेकिन पहले से ही प्रदूषण से प्रभावित क्षेत्र में नई खदानों की अनुमति को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
बंद खदानों की स्थिति चिंताजनक
क्षेत्र में वर्षों से संचालित कई खदानें अब बंद हो चुकी हैं, लेकिन उनके गहरे गड्ढे खुले पड़े हैं। कहीं पानी भरा है तो कहीं धूल उड़ रही है। न तो पुनर्वास (रिक्लेमेशन) हुआ है और न ही पर्यावरण सुधार के उपाय किए गए हैं।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जब पुरानी खदानों की जिम्मेदारी नहीं निभाई गई, तो नई खदानों को अनुमति क्यों दी जा रही है।
बढ़ती बीमारी और घटती खेती
ग्रामीणों का कहना है कि खदानों और क्रशर उद्योगों से निकलने वाली धूल ने हवा को प्रदूषित कर दिया है। लोगों में सांस की तकलीफ, खांसी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी का खतरा भी बताया जा रहा है।इसके अलावा भूजल स्तर गिर रहा है, नदी-नाले सूख रहे हैं और खेती की उपज लगातार घट रही है। धान उत्पादन में गिरावट से किसानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
प्रशासन पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन स्थिति से अनजान नहीं है, बल्कि जानबूझकर अनदेखी कर रहा है। यदि इसी तरह खदानों को मंजूरी मिलती रही तो क्षेत्र भविष्य में गंभीर प्रदूषण और बीमारी का केंद्र बन सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले भी जनसुनवाई में विरोध दर्ज कराया गया था, लेकिन उसके बावजूद नई खदानों की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इससे यह धारणा बन रही है कि प्रशासन जनता की बजाय खनन कंपनियों के पक्ष में खड़ा है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि खदानों और क्रशर उद्योगों ने जीवन मुश्किल कर दिया है। धूल से घर, खेत और पानी सभी प्रभावित हो रहे हैं।उनका कहना है कि बिना वैज्ञानिक जांच और पर्यावरण सुधार के नई खदानों को मंजूरी देना पूरी तरह जनविरोधी निर्णय होगा।
